હાસ્ય દરબાર

ગુજરાતી બ્લોગ જગતમાં રોજ નવી જોક અને હાસ્યનું હુલ્લડ

बिक न जाए

साभारश्री. उल्लास ओझा, बम्बई

ऐसे तो यह कविता शोककी है, पर ईस माहौल पर भी हंसी आ गयी !

किसी कवि ने क्या खूब लिखा है।
👌👌
बिक रहा है पानी,
पवन बिक न जाए ,

बिक गयी है धरती,
गगन बिक न जाए

चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं .,
डर है की सूरज की तपन बिक न जाए ,

हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ नीति,
डर है की कहीं धर्म बिक न जाए ,

देकर दहॆज ख़रीदा गया है अब दुल्हे को ,
कही उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए ,

हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता ,
कही इन्ही के हाथों वतन बिक न जाए ,

सरे आम बिकने लगे अब तो सांसद ,
डर है की कहीं संसद भवन बिक न जाए ,

आदमी मरा तो भी आँखें खुली हुई हैं
डरता है मुर्दा , कहीं कफ़न बिक न जाए।…..
👌👌

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4 responses to “बिक न जाए

  1. Narendra Pandya એપ્રિલ 6, 2016 પર 1:20 પી એમ(pm)

    –It seems- everything can be – possible now – We all see these— Nobody can stop -all these-
    unwanted—
    Let us hope better –that– -if we -all- do not — Bik Ja Ye– finally —from this Earth—

  2. Vinod R. Patel એપ્રિલ 3, 2016 પર 10:35 એ એમ (am)

    कवी का नाम ? बहुत बढ़िया ख्याल है ये कवीका और उसमें सच्चाई भी है !

  3. pragnaju એપ્રિલ 3, 2016 પર 7:11 એ એમ (am)

    जब टूटने लगे हौसले तो बस ये याद रखना,
    बिना मेहनत के हासिल तख्तो ताज नहीं होते,
    ढूँढ़ ही लेते है अंधेरों में मंजिल अपनी,
    जुगनू कभी रौशनी के मोहताज़ नहीं होते…..!!!!!!!!!!!

    • aataawaani એપ્રિલ 3, 2016 પર 7:57 એ એમ (am)

      बहु खूब आपने बहुत अच्छा कलाम पेश किया
      महाभारतकी मुविमे कर्ण गुरु द्रोणसे कहता हैकि योध्धा अपना बाहुबल से लड़ता है . वो किसीके आशीर्वादके कवच नहीं पहनता .

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